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एक कविता

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फ़िक्र हुई तो हमने पूछा अपने भी कुछ हाल सुनाओ , हाल दुरुस्त हैं, मिजाज़ बोरियत अब दिनवंत तुम ही बतलाओ , कुछ सूझा ना हमको उस पल    हम कुछ यूँ  ही कह बैठे ,      हम कुशल छेम अभिलाषा मे      फ़िर प्रश्न प्राप्ति कर बैठे ,   ...1 हमने पूछा वक्त बहुत है वक्त बिताते हो कैसे, क्या पढ़ते हो कविता मेरी या प्रेम पत्र हो ‘उसका’ जैसे , प्रेम प्रणय तो ह्रदयघात था,     यह प्रेमघात हम कैसे सहते , प्रेम शब्द की स्वीकृति पर तुम क्या कहते          यही सोच हम कभी - कभी हँसते रहते ,    ....2   यार दोस्तों के संग में जब  खेल तमाशे होते थे , अपनों के संग होकर भी हम यूँ अनजाने रहते थे , तुम बिना हमारी स्म्रति के  सब  मनन व्यर्थ से होते थे  ,       तुम बिना हमारे शब्द सभी ये                  ख़ाली कपोल से होते थे ,      ....3 बिना दिखावे के ये सब कुछ खेल तमाशे कैसे होते , बिना दिखावे...

द माउंटबेटन प्लान, 1947

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प्रस्तावना किसी भी विषय पर लिखने के लिए हम अपने मन में विचारों को एक जगह इकठ्ठा कर लेते हैं | इन विचारों के बारे में जानना अपने आप में ही एक अनोखा अनुभव होता है | ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ जब मैंने इस लेख को लिखना शुरू किया था | यह लेख भारतीय इतिहास की उस घटना का व्याख्यान करता है जिसने उस समय को लोगों के जीवन पर एक बहुत ही गहरा प्रभाव छोड़ा था | चूँकि हिंदुस्तान के विभाजन की घटना एक ऐतिहासिक घटना है और इतिहास के पन्नों में उसका विस्तृत वर्णन भी है इसलिए उसे एक लेख के रूप में लिखना मुझे थोड़ा मुश्किल काम लगा | लेकिन इस विषय के प्रति जो दिलचस्पी थी उसने कोई भी मुश्किल महसूस नहीं होने दी और यह लेख पूरा तैयार हो गया | इस लेख में कुछ क्षेपक भी जोड़े गए हैं जिसको पाठकगण अन्यथा नहीं समझेंगे, ऐसा मेरा मानना है | अब ज्यादा कुछ ना कहते हुए बस इतना बताना चाहूँगा कि इस लेख में जिस वास्तविकता का वर्णन मौलिकता के साथ करने का प्रयत्न किया गया है यदि वह प्रयत्न सफल हो गया हो तो एक बार बताइयेगा ज़रूर | धन्यवाद ! देवेश दिनवंत पाल | 14/07/2020 *****************************************************...