शिकारा ( फिल्म रिव्यू आर्टिकल)

                           शिकारा
फिल्म रिव्यु आर्टिकल को लिखने के क्रम में यह मेरा पांचवां आर्टिकल है | इस फिल्म में भारतीय इतिहास की उस घटना का बड़े ही विस्तृत और सटीक तरीके से वर्णन किया है जिसके कारण 4,00,000 कश्मीरी नागरिकों को अपने घर और कश्मीर को छोड़कर प्रवासियों की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ा | इस घटना के बीच में ही एक प्रेम कहानी भी पनपती है | उस कहानी को भी बेहद खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया गया |
विधु विनोद चोपरा के निर्देशन में बनी इस फिल्म की शुरुआत होती है एक इत्तेफाक से | इत्तेफाक ऐसा जो व्यक्ति के जीवन में प्रेम को परिभाषित कर उसका बोध कराकर चला भी जाता है , यह बात को जानते हुए भी कि “ जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है  |“ 
कहानी के मुख्य किरदार में डॉ. शिव कुमार धर (आदिल खान ) हैं जोकि एक कॉलेज प्रोफेसर हैं | और दूसरी तरफ शांति सब्रू (सदिया) हैं जोकि पेशे से नर्स हैं | यह दोनों ही अनजान लोग समय के संयोग से एक फिल्म की शूटिंग देखने कश्मीर की किसी घाटी में जाते हैं | इत्तेफाक से जब शिव की नज़र शांति की ओर जाती है , वह एकाएक रुक सा जाता है | एक क्षण के लिए शिव को लगता है कि अगर समय को रोका जा सके तो वह इस क्षण को रोककर हमेशा के लिए अपना कर लेगा | 
थोड़ी ही देर में एक स्पॉटबॉय आकर कहता है कि “फिल्म के एक सीन में एक कश्मीरी कपल की जरूरत है तो क्या आप मैडम प्लीज आएँगी , और वहां से आप सर  | “ उसका इशारा शिव और शांति की ओर होता है | उस सीन की शूटिंग के दौरान ही शांति को पता चल पाता है कि अब तक वह जिस शायर की किताब को इतना पसंद करती है वह खुद उसके पास खड़ा है | शिव अपनी किताब के बारे में शांति को बताता है और वहां से ही उन दोनों की बात शुरू होती है |
बातें , जब बातों को ख्याल, उम्मीद और प्यार का साथ मिल जाता है तो वह अलग ही असर करती है | और ऐसी ही बातें करते करते शिव और शांति कब एक दुसरे को अपना दिल दे बैठते हैं उन्हें खुद भी नहीं पता चलता | बात जब शादी तक पहुँचती है तो शिव अपने अलग अंदाज़ से शादी का प्रस्ताव शांति के सामने रखता है | शांति ख़ुशी के साथ उसके हाथ पर अपना हाथ रख देती है | और दोनों लोग साथ जीवन जीने का वायदा एक दूसरे से कर देते हैं |  शादी के बाद शिव शांति से पूछता है कि वह कहाँ घूमना पसंद करेगी तो शांति अपनी इच्छा बताती है कि “ अगर हो सके तो , कभी मुझे ताजमहल ले जाना | अगर हो सके तो....... !”  यह शांति की एक ऐसी इच्छा थी जो शायद उसके आखिरी समय पर ही पूरी हो पाती है | 
कुछ समय गुज़र जाने के बाद कश्मीर में अब आंदोलनों और रैलियों का हुजूम जुड़ने लगा था | जिसमे सिर्फ एक ही बात बताई जाती थी कि कश्मीर भारत  का हिस्सा नहीं है और यहाँ रहने वाले कश्मीरी पंडितों को यहाँ से जाना होगा | वक्त गुज़रने के साथ साथ यह आन्दोलन दंगों का रूप लेने लगे | यहाँ तक कि सरकारी संस्थाओं और दफ्तरों पर हमले होने लगे | इसी बिगड़े हालात के बीच एक दिन एक दंगे में उसके भाई की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है  और शिव अपने भाई को हमेशा के लिए खो देता है | 
हालात अब इतने बिगड़ चुके थे कि लोग अब कश्मीर को छोड़कर पलायन करने लगे थे | शिव और शांति को भी इसीलिए अपने कश्मीर और अपने घर को छोड़कर वहा से जाना पड़ा | जम्मू में स्थित मुठी रिफ्यूजी कैंप में लाखों लोग अपने घर से बेघर होकर आये , उनमे से शिव और शांति भी थे | कुछ वक्त गुजर जाने के बाद वहा के लोग उस रिफ्यूजी कैंप को ही अपना घर मानने लगे थे | शिव अब उसी रिफ्यूजी कैंप में बच्चों को पढ़ाने लगा था | अब शायद 28 साल बीत चुके थे जब वे दोनों कश्मीर से यहाँ आये थे | उस पुराने घर और कश्मीर की वादी की यादें हमेशा ही उनकी आँखों में नमी छोड़ जाती थी |
इसी बीच एक दिन अचानक शांति की हालत बहुत ज्यादा बिगड़ जाती है | डॉक्टर से परामर्श लेने के बाद पता चलता है शांति को लास्ट स्टेज ब्रेन ट्यूमर है | उसके पास कुछ आठ महीनो का ही जीवन बचा है | शिव इस बात को शांति को बिना बताये उसे वापस घर ले आता है | एक दिन अचानक एक ख़त आता है कि अमरीका के प्रेसिडेंट ने शिव के खतों का जवाब दिया है जोकि शिव उन्हें पिछले कई सालों से भेज रहा था | और प्रेसिडेंट ने उनसे मिलने के लिए उन्हें आगरा बुलाया है | शिव और शांति दोनों ही आगरा पहुचते हैं | बड़ी शान ओ शौकत सके साथ उन दोनों का स्वागत सत्कार होता है | वहां पहुचने के बाद शिव , शांति को बताता है कि यह सब इंतज़ाम और आगरा आने का न्योता प्रेसिडेंट ने नहीं बल्कि उसने खुद ही अपने घर भेजा था | इस बात को शांति समझ नहीं पाती | शिव , शांति को पूरी बात बता देता है और वह शिव के गले लगकर रोने लगती है | शिव शांति के आंसू पोछकर उसे उसकी इच्छा के अनुसार ताजमहल दिखाने ले जाता है | दोनों ही उस द्रश्य को देखकर हंसते हुए रोने लगते हैं | अचनक कुछ देर बाद,  उसी जगह ताजमहल के सामने , शांति अपनी आखिरी सांसे लेती है | और शिव की बाँहों में ही दम तोड़ देती है | 
कभी कभी इच्छायें ही जीवन को जीने का सहारा बनकर अंत तक साथ रहती है | जब वे स्वयं पूरी हो जाती हैं तो हमें उसी जगह छोड़ देती हैं जहाँ से हमने उन्हें बुनना शुरू किया था | विशुद्ध प्रेम में कुछ बातें एक ऐसा सहारा बन जाती हैं जिनके सहारे हम पूरी जिंदगी एक दुसरे के साथ गुज़ार लेते हैं  और जब अंत में वह व्यक्ति हमें छोड़ के जाता है तो उसकी यादें ही वो निशान बनके हमारे साथ जिन्दा रहते हैं जो हमें हमेशा उस व्यक्ति की उपस्थिति का आभास कराते रहते हैं | 
“प्रेम व्यक्ति को न जाने कितने रूप में देखने को मिलता है लेकिन असल में उसका आभास हमें तब होता है जब वह हमसे दूर चला जाता है |”
देवेश दिनवंत पाल |
25/08/2021

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