गांव वाले काका

बाहर से एक अजीब सा शोर सुनकर मैं AC वाले कमरे से बाहर निकला, यह देखने के लिए कि बात क्या है? पता चला कि गांव से काका आए हैं अनाज लेकर। उसी अनाज  को भंडार घर में इकठ्ठा किया जा रहा है। काका बड़ी ही तल्लीनता के साथ काम में लगे हुए थे, जोकि उनकी आदत ही थी।
मन में आया कि मैं भी काम में हाथ बटा दूं। तो मैं भी अनाज के भरे हुए बोरे को उठाकर भंडार घर में रखने लगा। 3 बोरे तो आसानी से रख दिए थे लेकिन चौथे को उठाते हुए मुझे अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ी। पांचवे की बारी आने तक मुझमें उसे उठाने की ताक़त ही नहीं बची थी। काका ने मुझे हांफते हुए देखा, क्यूंकि मैं अच्छी तरह से थक चुका था। " लाला आप ये रहने दीजिए हम सब हैं यहां, आप क्यों परेशान होते हो"। काका की बात में मेरे लिए फिक्र थी लेकिन मुझे इस फिक्र के साथ और भी कुछ महसूस हुआ, वो थी काका की मेहनत। आज तक समझ नहीं पाया था कि काका इतनी मेहनत के काम इस उम्र में कैसे कर लेते हैं, और वो भी बिना थके हुए। आज उस अनाज के बोरे को उठाते हुए मुझे इस बात का अच्छी तरह आभास हो चुका था कि किसान की मेहनत से उगाये गए इस अनाज में कितना वज़न होता है जिसकी बनी हुई रोटियों को कभी - कभी मैं आधा खाकर ही थाली में छोड़ते हुए मां से यह कह देता हूं कि " आज रोटी खाने का मन नहीं है मां ! "

"वाकई बहुत वज़न होता है उस बची हुई रोटी में...। और शायद उस आधी बची हुई रोटी का वज़न काका मुझसे ज्यादा बेहतर समझते होंगे। "

- देवेश दिनवंत पाल |
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