आख़िर कब तक ?

आखिर कब तक मैं.....
कब तक मैं अपने उन ख्यालों को अपने सीने में दफ़न करता रहूँगा जिनको मैंने कभी ये सोचकर बुना था कि एक ना एक दिन तुम उन्हें सुनने के लिए मुझसे जरूर कहोगी |
कब तक मैं उन सभी शब्दों को मन  ही मन गुनगुनाकर अपने आप को याद दिलाता रहूँगा जिनको मैंने सिर्फ ओ सिर्फ तुम्हारे लिए लिखा था |
कब तक मैं रात में अचानक से आँख खुलने पर तुम्हें याद करता रहूँगा और फिर आधी रात को जागने के बाद तुम्हारी उन सभी तस्वीरों को देखता रहूँगा जिनको मैंने गैर – इश्क़िया ढंग से इकठ्ठा किया था |
कब तक मैं अपने इस दिल को दिलासे की थपकी देकर मनाता रहूँगा जो आज भी तुम्हारे नाम को सुनकर अपने पूरे त्वरण के साथ चलने लगता है।
ऐसा नहीं है कि कोशिश नहीं की मैंने , हां लेकिन आज भी ये महसूस होता है कि कोई ना कोई कमी जरूर रखी थी, तभी तो आज तुम यहाँ हो, मेरी उन सभी प्रकाशित व अप्रकाशित रचनाओं में, मेरे उन अर्धनिर्मित मुक्तकों और गीतों में, मेरे उन अधूरे लेखों में, मेज पर बिखरे हुए पन्नों में, मेरी मेज की दराज़ में रखी हुई इलायची की खुशबू में, किताबों के बीच छुपाई गयी उस डायरी में जिसपर किसी की नज़र नहीं जाती , और तुम्हारी तुलना में लिखे गए शब्दों का तुम्हारी स्मृति से मिलान करने पर जो भी कमियां पाई जातीं हैं उन सभी कमियों में, तो आखिर कब तक मैं उन सभी कमियों को सुधारने की नाकाम कोशिशें करता रहूँगा |
इतना सब लिखने के बाद इस वक्त मैं यह बात सोच रहा हूं कि आख़िर कब तक मैं "आखि़र कब तक“ लिखता रहूँगा.......... | 
~ देवेश दिनवंत पाल ।
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