मेरी प्यारी बिंदु - (फ़िल्म रिव्यू आर्टिकल)
फिल्म रिव्यु आर्टिकल्स को लिखने के क्रम में यह मेरा तीसरा लेख है | इस लेख को लिखने के पीछे वैसे तो कई और भी वजह मैं बता सकता हूं लेकिन सबसे जरूरी और ख़ास बात मेरे लिए इसे लिखने की रही वो यह है कि इस फ़िल्म को मैंने पहली बार जब देखा तब इसके मायने उतने नहीं समझ पाए थे जितना आज इस वक्त लिखते हुए सोच पा रहा हूं | इस फ़िल्म को इतनी बार देख चुका हूं कि अब इसकी गिनती याद नहीं | हां लेकिन जब भी देखता हूं हर बार इसकी कहानी एक नयी बात का अहसास जरूर करा जाती है | बस उसी नयी बात को इस आर्टिकल में लिखने जा रहा हूं, जो अब तक अपने तक ही सीमित रखता था | यह कोशिश कितनी सफल होती है और कितनी असफ़ल, इसका निर्णय आप स्वयं इसे पढ़ने के बाद करियेगा |
- देवेश दिनवंत पाल |
13/02/2021 (12:10 AM)
“प्यार करना तो बहुत लोग सिखाते हैं, मगर अफ़सोस कि उस प्यार को भुलाते कैसे हैं ये कोई नहीं सिखाता |” इस लाइन को लिखने की सबसे सही जगह मैं शुरुआत में ही समझता हूं क्यूंकि इस आर्टिकल और इस फ़िल्म दोनों में ही कहानी की शुरुआत और उसका विराम इसी एक लाइन के साथ होता है | कहानी की शुरुआत होती है कोलकाता की उन सनसनाती सड़कों, नर्म धूप, उमस भरी शाम, मोहल्ले के किसी घर में रेडियो पर बजते किशोर दा के गाने और भरी दोपहरी में फुटबॉल खेलते बच्चों के झुण्ड और छत पर बैठे हुए एक कुत्ते से | कुत्ते को कहानी में एक नाम भी दिया गया है – “ देवदास “ | अब यही नाम क्यों दिया गया है, किसने दिया है ? इन सभी सवालों के जवाब हमें इस कहानी में ही मिलेंगे |
कहानी के शुरुआत में मुलाक़ात होती है मेरे सबसे पसंदीदा अभिनेताओं और कलाकार में से एक नाम आयुष्मान खुराना से | अभिमन्यु रॉय (आयुष्मान खुराना ) जो कि एक राइटर के किरदार में सभी के सामने आते हैं और हॉरर जेनर में कहानियाँ लिखकर पूरे पब्लिकेशन मार्केट में तहलका मचा रहे हैं और अपने लिखने के ढंग की वजह से तमाम सवालों और तर्कों से उलझे हुए भी हैं | अभिमन्यु रॉय के लिखने के ढंग में एक बात यह भी है कि लैपटॉप के ज़माने में भी वह टाइपराइटर पर लिख रहा है | लेकिन कुछ समय के बाद अब वह एक लव स्टोरी लिखने की कोशिश कर रहा है, जिसमें उसे अच्छी ख़ासी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है | और यही दिक्कतें ले जाती हैं उसे वहां, जहां से ये पूरी कहानी शुरू होती है, उसके अपने शहर कोलकाता में | अभिमन्यु रॉय की जिंदगी की फ्लैशबैक वाली कहानी अब यहाँ से शुरू होती है | जिसमें अभिमन्यु को एक ऐसे आशिक़ के रूप में दिखाया गया है जो किसी एक ख़ास वजह से अपने पड़ोस वाले छत के कमरे में बिना सीढ़ियों का सहारा लिए पेड़ टाप कर चला जाता है | जी हाँ , सही पढ़ा है आपने, पेड़ टाप कर | उस कमरे जो ख़ास वजह हुआ करती थी उसका नाम था – बिंदु |
बिंदु , एक शब्द में तो उसे सिर्फ आफ़त ही कहा जा सकता था और अभिमन्यु उसे आफ़त बुलाता भी था बदले में वह अभिमन्यु को उसके घरेलु नाम बूबला रॉय के नाम से चिढाती रहती थी | थोड़ी अल्लहड़ और खूब मस्त मिजाजी, किसी भी बात को बिना किसी संजीदगी से सुनने वाली, और हर बात पर अपना तर्क करने वाली , ऐसी ही कुछ थी बिंदु | बिंदु , वो नाम था जिसके बगैर अभिमन्यु कभी पूरा नहीं हो सकता था, आधी ख़तम क्लासिक माइल्स से बेहतर, बारिश में हाफ़ कटिंग चाय से अच्छी, या ऋषिकेश मुखर्जी के आनन्द के आखिरी दस मिनट से ज्यादा हार्टब्रेकिंग, जाकिर भाई का तबला, सचिन तेंदुलकर का स्टेट ड्राइव, धक् धक् करती माधुरी और बरसात में टिप टिप करती रवीना..... | कुछ इस तरह ही थी – बिंदु
उसकी मन बदलने वाली आदत के बारे कहा जाये तो ये है कि जब भी उससे कोई पूछता की बड़े होकर क्या बनोगी तो हर किसी को अलग अलग जवाब ही देती थी | माँ से बेहद प्यार करती थी जिन्होंने उसे सिखाया था कि “ जिंदगी एक पिघलती हुई आइसक्रीम की तरह है, टेस्ट नहीं किया तो वेस्ट हो जाएगी | बिंदु उस धुन की तरह थी जिसे आप एक बार सुन लें तो सारी जिंदगी वो आपका पीछा नहीं छोड़ती |
1983 में जब बूबला रॉय ने जियोग्राफी की क्लास में थंडरस्टॉर्म के बारे में पढ़ा तो ऐसा ही एक थंडरस्टॉर्म उसकी जिंदगी में भी आया था, एक बोरिंग से ट्यूसडे को एक पुरानी सी एम्बेसडर में जिसका नाम था - बिंदु शंकरनारायण | हर एक महान इंडियन लव स्टोरी की तरह अभिमन्यु उर्फ़ बूबला रॉय की लव स्टोरी की भी शुरुआत कुछ इस तरह होती है कि पहली नज़र देखा और देख के धक् से एक धक्का दिल में लगा | अब इस धक्के का असर बूबला रॉय की जिंदगी में इतनी ज़ोर से होगा ये तो ख़ुद बूबला रॉय को भी नहीं पता था | बिंदु अगर अपनी बात पर आ जाती थी तो कुछ भी टेढ़ा मेधा उल्टा सीधा करा ही लेती थी बूबला रॉय से | जैसे की बूबला रॉय को पालतू जानवरों से नफरत होने के बाद भी उसे एक कुत्ता पालने पर राज़ी कर लेना और कुत्ते का नाम देवदास रख देना |
वक्त बीतने के साथ साथ दोनों ही अपनी कॉलेज पढाई को पूरा करके अपने भविष्य की और देखने लगते हैं | कॉलेज खत्म होने बाद दोनों के रास्ते जैसे की बिल्कुल अलग से हो गए थे | वे दोनों पड़ोसी तो थे लेकिन अब उन सभी बातों के मायने जैसे वक्त के साथ बदल से गए थे | इस गुज़रते हुए वक्त के साथ साथ बिंदु अपनी माँ को एक कार एक्सीडेंट में हमेशा के लिए खो देती है जो शायद उसके लिए जीवन का सबसे बड़ा सदमा होता है | इस दुःख को ख़ुद में समेटकर, जिंदगी से दूर भागने की कोशिश में वह कोलकाता से बहुत दूर कहीं निकल जाती है और वहीँ बूबला भी अपनी आगे की पढाई के लिए कोलकाता से चला जाता है | दोनों के बीच की दूरी अब शायद इतनी ज्यादा हो चुकी थी कि कभी सोचा भी नहीं होगा कि यही दूरी एक दिन इन्हें पास लेकर आने वाली है | चार साल बाद एक इत्तेफाक़ की वजह से बिंदु और अभिमन्यु एक ही शहर में एक दूसरे को देख लेते हैं | वक्त इतना गुज़र चुका था कि बूबला रॉय अब अभिमन्यु रॉय था और बिंदु, वो बिल्कुल वैसी ही थी बिना किसी बदलाव के । बरमन दादा के गानों की धुन की तरह उसने भी अभिमन्यु की जिंदगी वापस एंट्री मारी थी | इतने वक्त बाद की मुलाक़ात में अभिमन्यु समझ नहीं पा रहा था कि उसे बिंदु से किस तरह बात करनी चाहिए, क्या पूछना चाहिए ? इस उलझन और हडबडाहट का होना लाज़मी भी था क्यूंकि बिंदु को इतने सालों बाद देखते हुए अभिमन्यु के मन में चल रहा था कि – “ बिंदु शंकरनारायण जैसी लड़की आफत जरूर होती हैं और इनसे दिल लगाने का मतलब है कि फ्रीफाल्ट, कहाँ आकार रुकेंगी, क्या क्या फूटेगा, नहीं पता, और उसका कोई हिसाब भी नहीं | लेकिन किसी ने ये क्यों नहीं बताया कि प्यार में इतनी ठोकर खाने के बाद, जख्म पर आयोडेक्स मलकर, वीर जवान हमेशा खड़े हो जाते हैं, एक और कोशिश करने के लिए |” और शायद अब ऐसी ही कोशिश अभिमन्यु करने जा रहा था, एक कोशिश बस उस शख्स के लिए जिसे वह अपने बचपन से प्यार करता था | जब उसे लव की स्पेलिंग तक नहीं आती थी उसका मतलब तो दूर बात थी तबसे जिस शख्स को प्यार किया हो वो थी – बिंदु | और ये कोशिश वो बिंदु के लिए बिंदु से करने जा रहा था | अब यह कोशिश कितनी सफ़ल होती है और कितनी असफ़ल, इसका पता तो फिल्म में ही पता चलता है | लेकिन अगर देखा जाये तो जिंदगी की कहानी में कुछ मोड़ और कुछ बदलाव इस तरह से आते हैं कि हमें उस वक्त क्या सही फ़ैसला लेना होता है, यह नहीं समझ पाते | कुछ बातों और समय का हमारे जीवन में ना होना ही उसकी सफलता का निशान होता है | वह बातें जब हमारे जीवन का हिस्सा नहीं होती हैं तभी वे हमारे जिंदगी का किस्सा बन पाती हैं | जिन्हें हम हमेशा अपने ज़हन में भूली बिसरी यादों की तरह याद रखते हैं और जब कभी किसी पुराने गाने की तरह उन लोगों को गुनगुना कर याद कर लेते हैं |
कहानी के आखिर में जब बिंदु उस लव स्टोरी को पढ़ती है जो अभिमन्यु ने अपनी नयी किताब के लिए लिखी है, तब अभिमन्यु से कहती है कि – “ यह तुम्हारी कहानी है अभि, मेरी वाली थोड़ी अलग होती “ इस बात पर अभिमन्यु बिंदु से सवाल करता है और बिंदु उसका क्या जवाब देती है यह एक सवाल है फिल्म को देखने वालों के लिए | अभिमन्यु उसकी और बिंदु की कहानी को उन कागजों में उतारकर हमेशा के लिए महफूज़ कर देता है | जिंदगी भी गानों की रील की तरह ही तो है कभी कोई गाना इतना पसंद आ जाता है कि भूलने का नाम नहीं लेता और कभी किसी गाने की सिर्फ धुन हमें याद रह जाती है | हम सब की जिंदगी में ऐसे ही कुछ लोग इन्हीं गानों की तरह होते हैं जिन्हें या तो हम कभी भूल नहीं पाते या फिर जिनकी हमें सिर्फ धुन ही याद रह जाती है | साहिर लुधयानवी की इस बात को लिखते ही मैं अपनी कलम को अब रखने ही वाला हूं कि – “ जब भी किसी क़िस्से को उसके अंजाम तक पहुँचाना, नामुमकिन हो जाये तो उसे एक बेहतर मोड़ देकर छोड़ देना चाहिए |” साहिर ने शायद यह बात इसलिए ही कही होगी क्यूंकि कुछ बातें अपने आप में अधूरी छूटकर ही मुकम्मल हो पाती हैं, शायद उनका पूरा न होना ही यह बताता है कि यह कहानी ऐसे ही कई अभिमन्यु और बिंदु की है जिसमें हर एक अभिमन्यु बस यही कहता हुआ सुनाई देता है कि – “प्यार करना तो बहुत लोग सिखाते हैं, मगर अफ़सोस कि उस प्यार को भुलाते कैसे हैं ये कोई नहीं सिखाता |”
- देवेश दिनवंत पाल
14/02/2021 (1:57 AM)
बहुत सुन्दर.......😊😊😊😊
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद गरिमा जी 😊
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