यात्रा संस्मरण


प्रस्तावना

काव्यनामा के इस पेज पर ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि मैं किसी अन्य व्यक्ति के लिखे हुए शब्दों या लेख को यहाँ प्रकाशित कर रहा हूं | लेकिन मेरा मानना है कि शब्दों में इतना सामर्थ्य होता है कि वह अपनी जगह ख़ुद ही बना लेते हैं | अब वह जगह चाहे कागज़ के पन्नों पर बनानी हो या पाठकों के मानस पटल पर | पूजा सक्सेना जी के शब्दों में मुझे वह सामर्थ्य बिल्कुल साफ़ दिख रहा था जब मैंने उनके लेख को पढ़ा | उनके इस लेख को पढ़ते समय मुझे हिंदी साहित्य में यात्रा वृतांत के युगवाहक राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य खूब याद आ रहा था | पूजा जी ने शब्दों का चयन बड़ी ही तन्मयता के साथ किया है जोकि इस लेख को और भी असाधारण बना रहा है |

                                       - देवेश दिनवंत पाल |  

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देशाटन शब्द से ही हमें इसके अर्थ का पता चल जाता है | देशाटन अर्थात देश विदेशों की यात्रा, वहां की संस्क्रति तथा रीति रिवाज़ों तथा व्यक्तियों से परिचित होना | देशाटन द्वारा हम विभिन्न स्थानों की प्रकृति तथा कला से अवगत होते हैं | जैसे पहाड़ी स्थानों पर देशाटन से वहां की प्रकृति, स्वच्छ, जलवायु, मनोरम तथा लुभावने द्रश्यों को देखने का, जानने एवं महसूस करने का अवसर प्राप्त होता है |

ऐसा ही एक सुनहरा अवसर हमें भी प्राप्त हुआ जब एक दिन हम कुछ साथी छात्र अपनी संगणक प्रयोगशाला (computer lab) में बैठे थे और हमारे अध्यापक माननीय हरीश जी हमें संगणक की कुछ महत्वपूर्ण बातों से अवगत करा रहे थे कि हमारे हिंदी कार्मिकी के विभागाध्यक्ष श्री उमापति दीक्षित जी ने प्रवेश किया | उन्होंने हमें सूचनार्थ किया कि 10 दिसंबर बुधवार को हमारा शैक्षिणिक टूर जाने की संभावना हो रही है जो संभवता नैनीताल जा रहा है | उन्होंने हमसे पूछा कि आप सब लोग क्या इससे सहमत हैं ? हमने आपस में विचार विमर्श करके अपनी अपनी सहमति दे दी | वह संभवता, पूर्णता बन 10 दिसंबर के रूप में परिवर्तित हो गयी | उस सुबह हम सभी छात्र बहुत उत्साहित थे कि हमने सोचा भी नहीं था स्नातक शिक्षा स्तर पर भी हम देशाटन पर जायेंगे | हमारे साथ साथ हमारे समस्त गुरुजन श्री उमापति दीक्षित जी, श्रीमान कैलाश जी, श्री नरेन्द्र पाल सिंह जी, श्री लतीफ़ सर, डॉ. गीता शर्मा तथा श्री भारती जी भी कम उत्साहित नहीं थे | उस दिन मानो हमारे सभी गुरुजन हमारे साथ छात्रों की संगति में ही थे | हम सभी लगभग 7:30 A.M. तक अपने अपने घरों से अपनी बस पर जोकि लाला उदित नारायण विद्यालय के सामने खड़ी थी, पहुँच गए | विचार विमर्श तथा कुछ वाद विवाद के पश्चात प्रातः लगभग 07:45 पर हमने बड़े उत्साह के साथ अपने प्रियजनों से विदाई ली और प्रस्थान किया |

उत्साह और देशाटन की ख़ुशी हमारे चेहरे पर साफ़ प्रतीत हो रही थी | हम सभी अपनी अपनी सीटों पर व्यवस्थित हो ही रहे थे कि बहेड़ी बस स्टेशन पर हमारी बस रुकी तथा कुछ छात्रों ने उसमें प्रवेश किया | बस फिर चलने को हुई तभी हमारे प्राचार्य महादेव ने हम सबको “Best of journey” कहा | प्राचार्य महोदय की शुभकामनाओं के साथ हमारी बस रवाना हुई और पुनः कुछ समय पश्चात रुकी और श्री कैलाश जी ने बस में प्रवेश किया | बड़े ही उत्साह के साथ सुबह की स्वच्छ हवा एवं सूर्य देवता की सुनहरी किरणों का आनंद  लेते हुए आगे बढे | अचानक हमारी बस पुलभट्टा तथा किच्छा के बीच पढ़ने वाली एक कर शुल्क चुंगी पर रुकी शायद कर देने के लिए |

हम सभी गाते गुनगुनाते अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे , हमारे गाने के बोल थे ,- “ हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन .........” किच्छा में प्रवेश करते ही हमारी अन्त्याक्षरी प्रारंभ हो गयी | एक ओर हम छात्राएं एवं दूसरी ओर छात्र थे | हमारे गुरुजन तो बड़े दल बदलू थे उनमें से प्रमुख थे कैलाश जी एवं दीक्षित जी | वे दोनों ही दलों को समर्थन दे रहे थे | हमने अपनी अन्त्याक्षरी में मग्न होने के साथ ही लालकुआं की फैक्ट्री, हल्दूचौढ का गायत्री शक्ति पीठ, हल्द्वानी का बाज़ार तथा चौराहा पर बना मंदिर, जोकि बहुत सी घंटियों से लदा था | जानकारी प्राप्त करने पर पता चला कि जो यहाँ घंटा चढ़ाता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है और शीतलामाता, जिनका मंदिर काठगोदाम में है, के दर्शन के बाद यहाँ आता है वह घंटी चढ़ाता है तभी उसकी यात्रा पूर्ण होती है, आदि से आगे बढ़ रहे थे | हम लगभग पहाड़ों की उचाईयों को छूने लगे थे | न किसी को ठंड की चिंता न ही किसी को ऊंचाई का डर, बस अपनी अपनी खिडकियों से प्रकृति के मनोहर द्रश्यों का आनंद ले रहे थे |

हममे से हमारे कुछ साथियों के स्वास्थ्य परिवर्तित होने लगे | शायद उन्हें ऊँचाइयों से डर लगता था | डर तो हमें भी भीतर लग रहा था | हम कुछ साथी गुनगुना रहे थे,

“हर घडी बदल रही है रूप जिंदगी, छांव है कहीं कहीं है धूप जिंदगी, हर पल यहाँ जी भर जियों, जो है समां कल हो न हो “ क्यूंकि रास्तों के वो सारे भयानक मोड़ और अपने साथियों की हालत देखकर ये बोल सटीक लग रहे थे |

हम सब हँसी मजाक  करते गुनगुनाते अपना सफ़र तय कर रहे थे कि हमारी बस ने “जौली कोट” में विश्राम लिया | हमारे गुरुजन ने सभी छात्र छात्राओं तथा अपने लिए चाय कुछ खाने का आदेश दिया | उसके बाद बस पुनः आगे प्रस्थान कर चली | हमारी बस से हमने “जॉली कोट” के पास एक Don-Bos-Co नाम का स्कूल देखा जो हमारी बस से काफी नीचे की ओर था और ऊंचाई की वजह से और भी अच्छा लग रहा था | अब मंजिल ज्यादा दूर नहीं थी क्यूंकि नैनीताल की ऊँची इमारतें और लुभावने द्रश्य हमें दिखने लगे थे |

हमारे देशाटन का आरम्भ एक बहुत ही पवित्र और सुंदर “हनुमान गढ़ी का मंदिर “ जोकि नैनीताल से 31 km की दूरी पर था, से हुआ | हम सभी उत्साह के साथ नंगे पांव मंदिर की ओर बढ़ चले | जब हमारे पैरों ने मंदिर की शीतल और पावन भूमि को छुआ तो ऐसा लगा जैसे पहाड़ों की सारी ठंडक बस उस मंदिर के प्रांगण में नतमस्तक हो रही थी | वहां हमने “बजरंग बली “ की एक बड़ी प्रतिमा के दर्शन दिए और प्रसाद ग्रहण किया | वहां की बागवानी, लुभावनी फूलों को देखकर मन ने कहा कि कहीं यही तो स्वर्ग नहीं हैं | एक ओर इतना सुंदर मंदिर और दूसरी ओर इतनी सुंदर फुलवारी |

William Wordsworth ने सच ही कहा है कि “God made flowers to beautify the earth and man’s careful mood.

मंदिर के अन्त तक चलते चलते हमारी एक साथी ने एक मार्ग देखा | अपने गुरूजी श्री नरेन्द्र जी से पूछने पर पता चला कि वह मार्ग एक आश्रम को जाता है | हम सभी उस रास्ते पर चल पड़े | वह रास्ता बड़ा ही दुर्गम था | परन्तु रास्ते में कई रमणीक द्रश्य थे | आश्रम पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि वह श्री लीलाशाह जी का आश्रम था | यह उनकी तपस्या और त्याग का ही फल था की वह स्थान आज इतना मनोरम और सजीव है | वहां हमारी भेंट एक महापुरुष अशोक सिंह से हुई | उन्होंने हमें आश्रम और लीलाशाह जी के जीवन के बारे में जानकारी दी | सच आश्रम में हमने मन की शांति का अनुभव किया |

हमारा देशाटन स्थल नैनीताल, बहेडी से लगभग 92 km दूर था | परन्तु गाते गुनगुनाते, मनोरम द्रश्यों का आनंद लेते हुए हमारी बस ने कब नैनीताल में प्रवेश किया पता ही नहीं चला | इस रमणीय स्थान की शुरुआत होटल और सिर्फ होटल से होती है | हमारी बस के एक स्थान पर रुकने के पश्चात् हम सभी साथी और गुरुजन बाहर आये और सभी साथी तथा गुरुजन नैनीताल की ठंडी झील के किनारे चलने लगे | चरों तरफ हरी भरी वादियों से ढके तथा ठंडी झील के चारों ओर बसे नैनीताल को देखकर लग रहा था कि शाद ही हममे से किसी को कोई चिंता या परेशानी होगी और जिनका स्वास्थ्य कहब हो रा था उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि वे किसी डॉक्टर के पास से रहे हों | इस सब को देखकर लगा कि Mr. H.J. Boh ने सही कहा है  - “प्रकृति, समय और धैर्य ये तीनों महान चिकित्सक हैं “

जैसे की देशाटन की शुरुआत मंदिर से हुई थी, नैनीताल भ्रमण की शुरुआत भी फ्रांसिस चर्च से हुई | जहां हमने “ईसा मसीह “ की सूअर प्रतिमा के दर्शन किये | हमने शायद पहली बार गिरिजाघर में प्रार्थना की थी तो जैसे समझ में आया वैसे प्रार्थना की और वैसे भी Prayer need no speech – M.K. Gandhi.

हम चर्च से नीचे नैनीताल की मालरोड सेचालते हुए “ नैनादेवी के मंदिर” पहुंचे | वहां पास दुकान से प्रसाद खरीदा और मंदिर का परिचय भी लिया | उन्होंने बताया की देवी का बायाँ नेत्र गिरने के कारण यहाँ का नाम नैनादेवी मंदिर पड़ गया | हम सभी को अब भूख का अहसास होने लगा था | सभी स्टेडियम रोड से होते हुए मस्जिद के पास Pure Vegetarian Hotel पर गए गए और सभी ने वहां भोजन किया | थोड़े से आराम के बाद हम सभी बाज़ार की ओर चल पड़े और हमने वहां खरीददारी की | सभी ने वहां की प्रसिद्ध मोमबत्तियां खरीदी | स्टेडियम रोड से नीचे बाज़ार में गए और वहां खरीददारी की और गुरूद्वारे के दर्शन किये | हमने वहां हनुमान गढ़ी, नैनादेवी का मंदिर, गिरिजाघर, मस्जिद तथा गुरूद्वारे को देखा और महसूस किया कि धर्म का भेदभाव इस स्थान पर मिट गया है | और वैसे भी देशाटन में अनेकता में एकता के दर्शन होते हैं |

घुमते और खरीददारी करते कब वापसी का समय हो गया पता ही नहीं चला | शाम के 5:30 बजे गुरुजनों ने हमें खोजना शुरू कर दिया | उस समय नैनीताल ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो कोई चमकता हुआ हीरा अपनी चमक दूर तक बिखेर रहा है | नैनीताल से विदा लेते वक्त मालूम हुआ कि इस सुंदर Lake City, Queen Of Hills – Nainitaal को 1841 में एक ब्रिटिश व्यक्ति T.Barron ने खोजा था |

हम लगभग 6:00 बजे वहां से चल दिए | सभी इतना घूमकर थक चुके थे परन्तु किसी के जोश में कोई कमी नहीं थी | सभी वैसे ही गुनगुनाते कब नैनीताल की मनोरम वादियों से गुजरते हुए दुबारा अपनी दुनिया में वापस आ गए पता ही नहीं चला | यहाँ आकार सभी अपने घरों की ओर चल दिए | जैसा कि देशाटन से बहुत कुछ देखने जानने को मिलता है हमने अपने देशाटन से बहुत कुछ जानकारी तथा सबसे महत्त्ववपूर्ण चीज़ अपने गुरुजनों का दूसरा रूप देखने को मिला, उन्हें जानने का मौका मिला |

                                  - पूजा सक्सेना

                                  बी.ए. (तृतीय वर्ष) 


 

Comments

  1. बहुत ही सुंदर शब्दों में देसाटन की यात्रा बताया गया है इसे पढ़के अपने देसाटन यात्रा की याद आ गई जो की आगरा गए थे(GSA) स्कूल से

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  2. Bahut hi sundar yaatra ka vivran..

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