शहीद दिवस
प्रस्तावना
गाँधी जी अपनी किताब हिन्द स्वराज में कहते हैं “ मैं जितने तरीकों से वायसराय को समझा सकता था, मैंने कोशिश की | मेरे पास समझाने की जितनी शक्ति थी, इस्तेमाल की | 23 वीं तारीख़ की सुबह मैंने वायसराय को एक निजी पत्र लिखा जिसमे मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी | भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे लेकिन वे हिंसा को अपना धर्म नहीं मानते थे | इन वीरों ने मौत के डर को भी जीत लिया था, उनकी वीरता को नमन है | खून करके अगर शोहरत हासिल करने की प्रथा शुरू हो गयी तो लोग एक दुसरे का क़त्ल करके न्याय तलाशने लगेंगे “ इस कथन को पढते वक्त मैं 23 मार्च,1931 के उस दिन को, उन सभी लोगों को और उन सभी परिस्थितियों को याद कर रहा था जो उस दिन के प्रत्यक्ष गवाह रहे होंगे | कई दोस्तों ने कहा भी कि शहीद दिवस के लिए कुछ लिखने का मन नहीं है क्या ? मन तो बहुत किया कल लिखने का, लेकिन लिखने से ज्यादा, मैंने उनके बारे में पढ़ने का निर्णय लिया और जो भी जितना भी कल पढ़ा वह इस लेख में लिख रहा हूं | कुछ जगहों पर कलम रुक भी गयी थी और मैं भावुक भी हुआ था लेकिन लेख को पूरा लिखा, क्यूंकि क्रांतिकारियों की वीरगाथाएं भावुकता नहीं बल्कि सम्मान और गर्व के साथ कही जाती हैं |
लेख में सभी ऐतिहासिक तिथियों और तथ्यों का मूल स्त्रोत बी.बी.सी. न्यूज़ हिंदी है |
देवेश दिनवंत पाल |
24/03/2021
लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च,1931 को हिंदुस्तान के इतिहास की एक ऐसी ऐतिहासिक घटना होने वाली थी जिसका प्रभाव आने वाले समय में ब्रिटिश हुकूमत के समाप्त होने के कारणों में से एक था | “कभी वो दिन भी आएगा, कि जब आज़ाद हम होंगे, ये अपनी ही जमीं होगी, ये अपना ही आसमां होगा” इस गीत को गुनगुनाते हुए इंकलाब के तीन दीवाने अपने शरीर को त्याग कर हमेशा के लिए अमर होने जा रहे थे | 23 मार्च का दिन भी जेल के बाकि के दिनों की तरह ही था लेकिन थोडा अजीब तब लगा जब जेल वार्डन चरत सिंह ने सभी कैदियों से कहा कि वे अपनी कोठरियों में चले जाये | इस बात का कारण पूछने पर सिर्फ इतना कहा गया कि “ ऊपर से आदेश है | “ कैदी इस बारे में कुछ कह पाते तब तक जेल का नाई बरक़त सभी कोठरियों से फुसफुसाता हुआ निकला कि “ आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है |”
भगत सिंह जेल की कठिन जिंदगी के आदी हो गए थे | उनकी कोठारी नं. 14 का फर्श पक्का नहीं था, उस पर घास उगी हुई थी | कोठारी में बस इतनी सी जगह थी कि उनका 5 फ़ीट 10 इंच का शरीर बमुश्किल ही उसमें आ पता था | भगत सिंह की मौत से 2 घंटे पहले मिलने पहुंचे उनके वकील प्राणनाथ मेहता कहते हैं कि “ वह अपनी छोटी सी कोठारी में पिंजरे में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे | उन्होंने मुस्कराकर मेरा स्वागत किया और पूछा कि क्या मैं उनकी किताब रेवोलुशनरी लेनिन लाये या नहीं | जब मैंने उन्हें किताब दी तो वह मेरे सामने ही किताब पढ़ने लगे जैसे की उनके पास अब ज्यादा समय ना बचा हो |” मेहता ने भगत सिंह से सवाल किया कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहते हैं ? भगत सिंह ने किताब से मुंह हटाये बगैर कहा “ सिर्फ दो सन्देश.... साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और इंक़लाब जिंदाबाद” इसके बाद भगत सिंह ने कहा कि वह उनका धन्यवाद नेहरु और बोस तक पहुंचा दे जिन्होंने मेरे केस में गहरी रूचि ली थी | भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने पहुंचे | राजगुरु के अंतिम शब्द थे “हम लोग जल्द मिलेंगे “| सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वह उनकी मौत के बाद जेलर से वह कैरमबोर्ड ले लें जो उन्होंने कुछ दिन पहले दिया था |
मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को सूचना दे दी कि उन्हें तय वक्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जाने वाली है | अगले दिन सुबह 6 बजे की बजाय उन्हें उसी शाम 7 बजे फांसी दी जा रही थी | भगत सिंह मेहता के द्वारा दी गयी किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे कि उनके मुहं से निकला कि “ क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे “ थोड़ी देर बाद फांसी की तैयारी शुरू कर दी गयी और तीनों क्रांतिकारियों को ले जाया गया | वे तीनों एक दूसरे का हाथ पकड़कर अपना प्रिय आजादी गीत गाने लगे “ कभी वो दिन भी आएगा, कि जब आज़ाद हम होंगे, ये अपनी ही जमीं होगी, ये अपना ही आसमां होगा | “ जेल की घडी नें जैसे ही 6 बजाये कैदियों ने दूर से आती बूटों की पदचापें सुनीं और साथ में एक गाने का भी स्वर सुनाई दे रहा था “ सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.......”
फांसी देने के लिए मसीं जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था | भगत सिंह बीच में खड़े हुए थे | वे अपनी माँ को दिया हुआ वचन पूरा करना चाहते थे कि वह फांसी के तख्ते से इंक़लाब जिंदाबाद का नारा लगायेंगे | तीनों क्रांतिकारियों के गले में रस्सी डाल दी गयी और उनके हाथ बांध दिए गए | जल्लाद ने पूछा कि सबसे पहले कौन जायेगा ? सुखदेव ने सबसे पहले हामी भरी | जल्लाद ने एक एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख्ते को हटा दिया | काफी देर तक उनके शव वहां लटकते रहे | बाद में उन्हें नीचे उतारा गया और वहां मौजूद डॉक्टरों, लेफ्टिनेंट कर्नल जे. जे. नेल्सन और लेफ्टिनेंट कर्नल एन. एस. सोंधी ने उन्हें मृत घोषित किया | पहले यह तय किया गया कि उनका अंतिम संस्कार जेल में ही किया जायेगा लेकिन यह फैसला त्यागना पड़ा क्यूंकि अधिकारीयों को यह आभास हो गया था जेल से धुआं उठता देख बाहर खड़ी भीड़ बेकाबू होकर जेल पर हमला कर सकती है | फिर यह विचार बनाया की रावी तट पर यह अंतिम संस्कार किया जाये लेकिन वहां पानी बहुत कम होने के कारण सतलज के किनारे शवों को जलाने का फ़ैसला लिया गया | अभी उनके शवों को आग लगायी ही गयी थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया और भारी जन सैलाब इस ओर आने लगा | जैसे ही ब्रिटिश सैनिकों ने लोगों को आते देखा वह शवों को वहीँ छोड़कर अपने वाहनों की तरफ भागे | इन तीनों क्रातिकारियों के सम्मान में तीन मील लम्बा शोक जुलूस लाहौर के नीला गुम्बद से शुरू हुआ और अनारकली बाज़ार के बीचो बीच जा रुका | जब भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों को लेकर वहां पंहुचा तो भीड़ अपने आंसुओं को नहीं रोक पायी | उधर जेल में भगत सिंह की फांसी के बाद वार्डन चरत अपने कमरे में पहुंचे और फूट फूट कर रोने लगे | अपने 30 साल के करियर में उन्होंने कई फंसियाँ होते देखी थी लेकिन किसी ने मौत को इतनी हिम्मत से कभी गले नहीं लगाया था जितना की भगत सिंह और उनके दो साथियों ने |
कम से कम उस समय किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी |
देवेश दिनवंत पाल |
24/03/2021
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