Posts

Showing posts from August, 2020

Manual scavenging (मैला ढोना) Documentary Film by Scoopwoop Unscripted.

Image
https://youtu.be/dCrHVj3MJgc Click on this link, 👆👆 to watch the full documentary video. “ हर दलित सफाई कर्मचारी नहीं है लेकिन हर सफाई कर्मचारी दलित है |” इस लाइन को एक बार पढ़ने भर से शायद ही इसका अर्थ समझ आये लेकिन यह बात बहुत ही गहन विषय के बारे में कही गयी है जिसके ऊपर Scoopwoop Unscripted चैनल ने यह डोक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाकर तैयार की है | यह फिल्म हमें समाज के एक ऐसे पहलू से बखूबी रूबरू कराती है जिसके बारे में शायद हमारा समाज सोचना भी मुनासिब नहीं समझता है | आजकल के समाज को एक बहुत ही कृत्रिम कारक प्रभावित करता है जिसका नाम है – “ जाति ” इस कारक को कृत्रिम कहने की मेरी अपनी एक वजह है | लेकिन दूसरे द्रष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि जाति एक ऐसी संज्ञा है जो समाज व्यवस्था में जन्म के आधार पर निश्चित होती है |  किसी नाले या गटर के आस पास से जब आप अपनी गाड़ी या बाइक से गुज़रते हैं तो आप और आपकी नाक दोनों ही उस जगह की बदबू से परेशान हो जाते हैं और आप नाक को किसी भी चीज़ से ढक लेते हैं लेकिन यह सफाई कर्मी घंटों तक इस्सी नाले में खड़े होकर इसकी सफाई करते रहते हैं | यह फिल...

तहसील भ्रष्टाचार मुक्त है.....

Image
तहसील भ्रष्टाचार मुक्त है “अबे शम्भू , मास्क कहे नहीं लगाये हो बे , कोरोना बीमारी का डर नहीं लगता का ?? मास्क लगाये रहो, नहीं तो बहुतय समस्या हो जायेगा गुरु !“ रज्जन भैया ने लगभग चुटीले अंदाज़ में इस बात को शम्भू से कहा | लेकिन शम्भू आज कुछ भी चुटीला सुनने के मूड में ना थे | “ अरे ससुरा, का होगा ज्यादा से ज्यादा मौत ही तो आएगा ना, हां तो आ जाये निपट लें उससे भी, मरना तो है ही |” शम्भू लगभग गुस्से से झल्लाते हुए ही यह बात कह रहा था | “अरे शम्भू , का हुआ बे , इतना तमतमाए हुए काहे हो ? कौनौ बात हुआ है का “ शम्भू की गुस्से की आग पर रज्जन भैया ने अपनी सांत्वना के कुछ पानी के छींटे मारते हुए कहा | दरअसल शम्भू की गुस्सा का कारण कोई और नहीं बल्कि उनके ही ग्राम पंचायत क्षेत्र के पटवारी महोदय थे, अब आखिर पूरा माज़रा क्या था यह तो शम्भू अभी ख़ुद ही बताएँगे | शम्भू ने अपनी मुठ्ठी में तंबाकू और चूने को रगड़ते हुए रज्जन भैया के सामने अपनी हथेली फैलायी और फिर बताया कि कोरोना काल शुरू होने से पहले ही उनके बुजुर्ग पिता का देहांत हो गया था जिसके कारण उन्हें अपनी नौकरी से छूट्टी लेकर इंदौर से अपने गाँव वाप...

अंग्रेजी में कहते हैं ...

Image
किसी भी फिल्म या नाटक के लिए लिखी गयी यह मेरी पहली टिप्पणी है | इस फ़िल्म के बारे में लिखने की एक ख़ास वजह यह भी हो सकती है कि इस फिल्म के प्रमोशन इंटरव्यू को जब पहली बार द लल्लनटॉप पर देखा था तो बहुत सी ऐसी नयी बातें देखने को मिली जिनको लिखे बिना मैं रह नहीं पाया | फ़िल्म की शुरुआत होती है अल्ल्हड़ और ख़ुशमिज़ाजी से भरपूर एक शहर , बनारस से | यह सिर्फ बाकि लोगों के कहने भर के लिए शहर होगा लेकिन यहाँ के लोगों और ख़ुद अपने लिए यह शहर आज भी भीतर से एकदम देसी है | फिल्म का पहला द्रश्य शुरू होता है बनारस के नंदेश्वर घाट से , और घाट की सुंदरता में बढ़ोत्तरी करते हुए वहां की भीड़, मंदिर में सुबह की मंगला आरती की आवाजें और घाट की सीढ़ियों से छलांग लगाते हुए बच्चे | कहानी के मुख्य किरदारों से मुलाकात होती है इसी घाट के पास बने एक घर “ बत्रा निवास “ में | घर में सबसे पहले हम मिलते हैं मिसिज किरन बत्रा के किरदार में एकावली खन्ना से जोकि इस मिडिल क्लास घर को हमेशा अप्पर क्लास या उससे भी बेहतर बनाये रखती हैं | सुबह की चाय में आधा चम्मच चीनी के साथ दिन की शुरुआत करने वाली किरन बत्रा एक बहुत ही शांत और बेह...