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Showing posts from September, 2020

Film review article on मुगल ए आज़म , ( The iconic film of Indian film industry)

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“तकदीरें बदल जाती हैं, ज़माना बदल जाता है, मुल्कों की तारीख़ बदल जाती है, शहंशाह बदल जाते हैं, मगर इस बदलती दुनिया में मोहब्बत जिस इंसान का दामन थाम लेती है......, वो इंसान नहीं बदलता |” यह पंक्तियाँ हिंदी/उर्दू सिनेमा की 173 मिनट समय वाली सबसे आइकोनिक और क्लासिकल फ़िल्म की है जिसने अपनी शानदार कहानी, जानदार अभिनय और कलाकारी तथा अपने उन जादुई गीतों से “मुगल ए आज़म ” नाम को भारतीय सिनेमा जगत की तकनीकी रूप से सबसे सफ़ल और उस समय की सबसे ज्यादा महंगी फिल्म साबित कर दिया था | 5 अगस्त सन् 1960 में आसिफ़ कमाल के निर्देशन में और स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन के बैनर तले यह फिल्म अपने समय की सर्वाधिक कमाई करने वाली फ़िल्म थी और इसी के साथ इस फिल्म ने फ़िल्मी जगत के कई कीर्तिमान भी स्थापित किये थे | अगर अपने निजी अनुभव की बात करूँ तो पहली बार जब इस फिल्म को देखा तो उन सभी बातों पर और भी पुख्ता भरोसा हो गया था जो इस फिल्म के बारे में सुनी थी और इस लेख में वे बातें ज़रूर साझा करूँगा | आज के समय तक इस फिल्म को कई बार देखा लेकिन हर बार इस कहानी में कुछ नया सा दिखाई दिया शायद इसलिए ही इस कहानी...

आख़िर कब तक ?

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https://youtu.be/-MxknQdEsRo आखिर कब तक मैं..... कब तक मैं अपने उन ख्यालों को अपने सीने में दफ़न करता रहूँगा जिनको मैंने कभी ये सोचकर बुना था कि एक ना एक दिन तुम उन्हें सुनने के लिए मुझसे जरूर कहोगी | कब तक मैं उन सभी शब्दों को मन  ही मन गुनगुनाकर अपने आप को याद दिलाता रहूँगा जिनको मैंने सिर्फ ओ सिर्फ तुम्हारे लिए लिखा था | कब तक मैं रात में अचानक से आँख खुलने पर तुम्हें याद करता रहूँगा और फिर आधी रात को जागने के बाद तुम्हारी उन सभी तस्वीरों को देखता रहूँगा जिनको मैंने गैर – इश्क़िया ढंग से इकठ्ठा किया था | कब तक मैं अपने इस दिल को दिलासे की थपकी देकर मनाता रहूँगा जो आज भी तुम्हारे नाम को सुनकर अपने पूरे त्वरण के साथ चलने लगता है। ऐसा नहीं है कि कोशिश नहीं की मैंने , हां लेकिन आज भी ये महसूस होता है कि कोई ना कोई कमी जरूर रखी थी, तभी तो आज तुम यहाँ हो, मेरी उन सभी प्रकाशित व अप्रकाशित रचनाओं में, मेरे उन अर्धनिर्मित मुक्तकों और गीतों में, मेरे उन अधूरे लेखों में, मेज पर बिखरे हुए पन्नों में, मेरी मेज की दराज़ में रखी हुई इलायची की खुशबू में, किताबों के बीच छुपाई गयी उस ड...

गांव वाले काका

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बाहर से एक अजीब सा शोर सुनकर मैं AC वाले कमरे से बाहर निकला, यह देखने के लिए कि बात क्या है? पता चला कि गांव से काका आए हैं अनाज लेकर। उसी अनाज  को भंडार घर में इकठ्ठा किया जा रहा है। काका बड़ी ही तल्लीनता के साथ काम में लगे हुए थे, जोकि उनकी आदत ही थी। मन में आया कि मैं भी काम में हाथ बटा दूं। तो मैं भी अनाज के भरे हुए बोरे को उठाकर भंडार घर में रखने लगा। 3 बोरे तो आसानी से रख दिए थे लेकिन चौथे को उठाते हुए मुझे अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ी। पांचवे की बारी आने तक मुझमें उसे उठाने की ताक़त ही नहीं बची थी। काका ने मुझे हांफते हुए देखा, क्यूंकि मैं अच्छी तरह से थक चुका था। " लाला आप ये रहने दीजिए हम सब हैं यहां, आप क्यों परेशान होते हो"। काका की बात में मेरे लिए फिक्र थी लेकिन मुझे इस फिक्र के साथ और भी कुछ महसूस हुआ, वो थी काका की मेहनत। आज तक समझ नहीं पाया था कि काका इतनी मेहनत के काम इस उम्र में कैसे कर लेते हैं, और वो भी बिना थके हुए। आज उस अनाज के बोरे को उठाते हुए मुझे इस बात का अच्छी तरह आभास हो चुका था कि किसान की मेहनत से उगाये गए इस अनाज में कितना वज़न होता...

स्वच्छता सर्वेक्षण अभियान 2020

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स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 का स्लोगन लिखवाते हुए ठेकेदार महोदय ने जब पान के पीक सड़क के किनारे पिचकाते हुए उस मजदूर को कहा कि "रंग थोड़ा गाढ़ा रखना दद्दा, लोगो की नज़र दूर से पड़नी चाहिए कि दीवार पर का लिखा है। लिखा हुआ एकदम साफ़ साफ़ दिखना चाहिए ।" इस पूरे वाकया को देखने के बाद यह बात मेरी समझ में आ चुकी थी कि शायद उस मजदूर के ब्रश में ऐसा कोई रंग नहीं था जो ठेकेदार महोदय को दीवार पर लिखे हुए शब्दों का अर्थ बता सकें।                                      देवेश दिनवंत पाल ।